रायसेन।

कृषि विभाग में आत्मा (ATMA) परियोजना के अंतर्गत ‘डिप्लोमा इन एग्रीकल्चर एक्सटेंशन सर्विस फॉर इनपुट डीलर’ (देसी डिप्लोमा) का एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। उपसंचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग के प्रशिक्षण हॉल में आयोजित इस सत्र में जिले के 40 कृषि आदान विक्रेताओं (अभ्यर्थियों) ने भाग लिया।

1 वर्ष का डिप्लोमा, स्वरोजगार की राह होगी आसान

हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय कृषि विस्तार प्रबंध संस्थान (MANAGE) द्वारा संचालित यह डिप्लोमा 1 वर्ष की अवधि का है। इसके तहत 52 सप्ताह तक हर हफ्ते 1 दिन क्लास आयोजित की जाती है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद अभ्यर्थी बीज, कीटनाशक और उर्वरक विक्रय का लाइसेंस बनवाकर कृषि आदान सामग्री का स्वयं का व्यवसाय शुरू कर सकेंगे।

कृषि यंत्रों, पराली प्रबंधन और कस्टम हायरिंग पर जोर

कार्यक्रम में केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान भोपाल के वैज्ञानिक डॉ. पीपी अम्बालकर, परियोजना संचालक (आत्मा) रवि आम्रवंशी तथा फैसिलिटेटर रघुवीर सिंह कुशवाहा उपस्थित रहे। वैज्ञानिक डॉ. अम्बालकर ने आधुनिक तकनीकों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि खेती में प्लास्टिक मल्चिंग का बेहतर उपयोग कैसे किया जाए। उन्होंने आगामी समय में धान की पराली प्रबंधन के लिए आवश्यक कृषि यंत्रों की जानकारी दी और कहा कि कस्टम हायरिंग सेंटर को व्यवसाय के रूप में अपनाकर अतिरिक्त आय अर्जित की जा सकती है।

कानूनी नियम, लाइसेंस प्रक्रिया और कीटनाशकों के मानक समझाए

परियोजना संचालक रवि आम्रवंशी ने अभ्यर्थियों को कृषि आदान सामग्री के भंडारण व विक्रय हेतु लाइसेंस प्रक्रिया, आवश्यक दस्तावेज और निर्धारित शुल्क की जानकारी दी। साथ ही उन्होंने व्यवसाय से जुड़े महत्वपूर्ण कानूनों पर विस्तार से चर्चा की, जिनमें शामिल हैं:

 सीड एक्ट 1966 एवं सीड कंट्रोल ऑर्डर 1983

 उर्वरक नियंत्रण आदेश 1985

 कीटनाशक अधिनियम 1968 व नियम 1971

 आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 की विभिन्न धाराएं

उन्होंने विक्रेताओं को किसानों के हितों को ध्यान में रखकर तय मापदंडों के अनुसार ही व्यापार करने के निर्देश दिए।

दवाइयों के डिब्बों पर बने रंगीन त्रिकोण का महत्व

प्रशिक्षण में पौध संरक्षण औषधियों (कीटनाशकों) के सही उपयोग पर विशेष ध्यान दिया गया। डिब्बों पर अंकित लाल, पीला, नीला और हरा त्रिकोण वाले निशानों के आधार पर दवाओं की घातकता समझाई गई। विशेषज्ञों ने सलाह दी कि फसलों में जरूरत पड़ने पर सबसे पहले कम जहरीली (हरे/नीले निशान वाली) दवाओं का ही प्रयोग करें, और अत्यंत आवश्यक होने पर ही अधिक जहरीली दवाओं की ओर बढ़ें।

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