नई दिल्ली:

गांधी जयंती के मौके पर देश की राजनीति में एक बड़ा सियासी तूफान खड़ा हो गया है। विपक्षी दलों और जन-आंदोलन से जुड़े संगठनों ने बापू की जयंती पर राजघाट से लेकर देशव्यापी सत्याग्रह और बड़े प्रदर्शनों की रूपरेखा तैयार कर ली है। केंद्र में है सिर्फ एक मांग—मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार का तुरंत इस्तीफा।

सड़कों पर उतरे कार्यकर्ताओं और विपक्षी खेमे का सीधा संदेश है कि महात्मा गांधी के सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलकर वे चुनावी लोकतंत्र को बचाने के लिए अब पीछे हटने वाले नहीं हैं।

गांधी जयंती पर ‘सत्याग्रह’ का दांव: क्यों भड़का है गुस्सा?

 मतदाता सूची और SIR पर बड़ा टकराव: विपक्ष का आरोप है कि विशेष पुनरीक्षण (SIR) की आड़ में एक खास वर्ग और विपक्षी समर्थकों के लाखों वोट चुपचाप काटे गए हैं। इसे सीधे तौर पर ‘वोट चोरी’ करार दिया जा रहा है।

 आयोग की साख पर खुला हमला: विपक्षी नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग निष्पक्ष अंपायर की जगह सत्ताधारी दल की ‘बी-टीम’ की तरह व्यवहार कर रहा है।

 2 अक्टूबर को बड़े प्रदर्शन की तैयारी: गांधी जयंती के प्रतीकात्मक महत्व को देखते हुए दिल्ली समेत राज्यों की राजधानियों में विरोध मार्च, धरने और संसद सत्र के लिए बड़े नोटिस की तैयारी की गई है।

क्या जा सकती है ज्ञानेश कुमार की कुर्सी? समझें संवैधानिक गणित

राजनीतिक दबाव चाहे कितना भी बढ़ जाए, लेकिन भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त को उनके पद से हटाना इतना आसान नहीं है। संविधान के तहत उन्हें सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के न्यायाधीश के समान सुरक्षा प्राप्त है:

1. सरकार सीधे नहीं हटा सकती:

संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत, केंद्र सरकार या कोई भी मंत्री मुख्य चुनाव आयुक्त को सीधे बर्खास्त या पदमुक्त नहीं कर सकता।

2. सिर्फ महाभियोग (Impeachment) का रास्ता:

CEC को हटाने का एकमात्र कानूनी रास्ता संसद में महाभियोग प्रस्ताव है। इसके लिए:

 संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में विशेष बहुमत (उपस्थित सदस्यों का दो-तिहाई और कुल सदन संख्या का 50% से अधिक) की आवश्यकता होती है।

 आधार केवल दो हो सकते हैं—’साबित कदाचार’ (Proven Misbehaviour) या ‘असमर्थता’ (Incapacity)।

3. संख्याबल किसके साथ?

वर्तमान संसद में एनडीए (सत्तापक्ष) के पास स्पष्ट ताकत है। बिना सरकार के समर्थन के किसी भी महाभियोग प्रस्ताव का पारित होना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन है। इसलिए केवल विपक्षी हंगामे या प्रदर्शनों से सीधे तौर पर कुर्सी जाना संभव नहीं दिखता, जब तक कि वह स्वयं नैतिक आधार पर इस्तीफा न दे दें।

आयोग और सरकार का रुख

चुनाव आयोग ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि मतदाता सूचियों को शुद्ध करना एक नियमित संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसमें किसी भी स्तर पर पक्षपात नहीं हुआ है। वहीं, सत्तापक्ष ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा है कि चुनाव में अपनी नाकामी को छिपाने के लिए संवैधानिक संस्थाओं पर हमला करना विपक्ष की पुरानी आदत बन चुका है।

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