अमेरिका का स्वार्थ या अपनी सेना से प्यार? अपने 1 जवान के बदले लेते हैं 1000 जानें!

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर यह देखा जाता है कि अमेरिका अपने 1 सैनिक की जान बचाने या उसका बदला लेने के लिए दूसरे देशों में भारी तबाही मचा देता है। क्या बाकी देशों के जवानों की जान की कोई कीमत नहीं है?

दुनिया में हर देश के लिए उसके सैनिक बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। हर सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह अपनी सेना की सुरक्षा सुनिश्चित करे। लेकिन, जब बात अमेरिका (America) की आती है, तो स्थिति थोड़ी अलग और भयानक नजर आती है।

अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या अमेरिका के 1 जवान की जान, बाकी दुनिया के हजारों जवानों या आम लोगों से ज्यादा कीमती है? क्या अमेरिका इतना स्वार्थी है कि अपने एक आदमी के लिए वह बाकी दुनिया की शांति को दांव पर लगा देता है? आइए अंतरराष्ट्रीय राजनीति (International Politics) की इस कड़वी सच्चाई को आसान भाषा में समझते हैं।

नो मैन लेफ्ट बिहाइंड’ (No Man Left Behind) पॉलिसी

अमेरिका की एक बहुत सख्त नीति है जिसे “नो मैन लेफ्ट बिहाइंड” कहा जाता है। इसका मतलब है कि वे अपने किसी भी सैनिक को युद्ध के मैदान में पीछे नहीं छोड़ते। अमेरिका की जनता अपने सैनिकों को लेकर बहुत भावुक है और वहां की सरकार पर हमेशा यह दबाव रहता है कि हर अमेरिकी नागरिक और जवान सुरक्षित रहे। जब भी अमेरिका के किसी 1 सैनिक पर आंच आती है, तो वहां की सरकार इतना आक्रामक रवैया अपनाती है कि दुश्मन देश को इसकी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ती है।

ड्रोन और मिसाइल: अमेरिका का ‘सेफ गेम’

अमेरिका का रक्षा बजट दुनिया में सबसे ज्यादा है। उनके पास ऐसी आधुनिक तकनीक है कि वे अब जमीन पर अपने सैनिक भेजने से बचते हैं। अमेरिका मीलों दूर सुरक्षित बैठकर ड्रोन और मिसाइलों से हमले करता है। इसका नतीजा यह होता है कि अमेरिका के अपने सैनिकों का नुकसान तो 0 (शून्य) के बराबर होता है, लेकिन जिन देशों पर हमले होते हैं, वहां हजारों लोग मारे जाते हैं। अपनी जान बचाने के लिए अमेरिका यह ‘सेफ गेम’ खेलता है।

क्या बाकी देशों के जवानों की जान ‘फ्री’ है?

बिल्कुल नहीं! हर देश के लिए उसका जवान अनमोल होता है और कोई भी देश अपने सैनिकों को यूं ही मरने के लिए नहीं छोड़ता। लेकिन समस्या यह है कि यह दुनिया नैतिकता (Morality) से नहीं, बल्कि ताकत से चलती है।

बाकी देशों के पास अमेरिका जैसी न तो आर्थिक ताकत है और न ही वैसे आधुनिक हथियार। कमजोर देशों को मजबूरी में जमीनी स्तर पर युद्ध लड़ना पड़ता है, जिससे उनके जवानों का ज्यादा नुकसान होता है। अमेरिका अपनी बेतहाशा ताकत के दम पर दुनिया में मनमानी कर लेता है और कमजोर देशों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है।

इसे अमेरिका का स्वार्थ कहें या अपनी जनता के प्रति उसकी जिम्मेदारी, लेकिन हकीकत यही है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्याय सबके लिए एक जैसा नहीं है। ताकतवर देश हमेशा अपनी शर्तों पर युद्ध लड़ते हैं, और इसकी सबसे बड़ी कीमत कमजोर देशों को अपने जवानों की जान देकर चुकानी पड़ती है। अमेरिका हमेशा अपना फायदा पहले देखता है, भले ही इसके लिए दुनिया को कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।

error: Content is protected !!