इंदौर/ मध्य प्रदेश :

एक तरफ मध्य प्रदेश में ‘लाड़ली बहना’ के नाम पर खजाने के दरवाजे खुले हैं, तो दूसरी तरफ दफ्तरों में दिन-रात खटने वाली हजारों सरकारी ‘बहनें’ आज खून के आंसू रोने को मजबूर हैं। मुख्यमंत्री हर मंच से कहते हैं कि “प्रदेश की हर महिला मेरी बहन है,” लेकिन जब उन बहनों को उनका पूरा हक देने की बारी आई, तो सरकार ने उनसे मुंह मोड़ लिया।

100% काम, फिर 70% ,80%, 90%वेतन की चोट क्यों?

जरा उस महिला कर्मचारी का दर्द सोचिए, जो सुबह उठकर घर का सारा काम करती है, अपने छोटे बच्चे को छोड़कर ऑफिस भागती है और वहां पूरे दिन 100% लगन से काम करती है। लेकिन महीने के अंत में जब उसकी मेहनत को सिर्फ 70% या 80% की तराजू पर तौला जाता है, तो उसका दिल टूट जाता है।

जब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इन बहनों के आंसू पोंछे और आदेश दिया कि इन्हें नौकरी के पहले दिन से 100% वेतन दिया जाए, तो इनके चेहरों पर एक उम्मीद जागी थी। उन्हें लगा था कि सरकार इस फैसले का स्वागत करेगी और उनके रुके हुए पैसे लौटा देगी।

एक बहन को लाड़, दूसरी को कोर्ट के चक्कर!

लेकिन सरकार का कदम इन बहनों के लिए एक गहरे सदमे जैसा है। सरकार खजाने पर “वित्तीय बोझ” का बहाना बनाकर अपनी ही महिला कर्मचारियों के खिलाफ अदालत के चक्कर काटने की तैयारी कर रही है। आज हर सरकारी महिला कर्मचारी के मन में यह पीड़ा उठ रही है:

• जब ‘लाड़ली बहना’ योजना के लिए हजारों करोड़ रुपये का कर्ज लिया जा सकता है, तो हमारी पसीने की कमाई खजाने पर बोझ कैसे हो गई?

• सरकारी नियमों के कारण हमें ‘लाड़ली बहना’ योजना का एक रुपया भी नहीं मिलता, चलिए कोई बात नहीं। लेकिन जो हमारी खुद की मेहनत की कमाई है, उसे रोकने के लिए सरकार महंगे वकील क्यों खड़े कर रही है?

अपनत्व के दावों पर आंसुओं का सवाल

आज इन बहनों की आंखों में बस एक ही सवाल है— “क्या कोई भाई अपनी ही बहन की गाढ़ी कमाई और उसका हक छीनने के लिए अदालत जाता है? अगर हम सच में आपकी बहनें हैं, तो हमारे साथ दफ्तरों में यह सौतेला व्यवहार क्यों?”

यह सिर्फ चंद रुपयों या सैलरी के एरियर का मामला नहीं है। यह उन हजारों बहनों के सम्मान, उनकी मेहनत और उस विश्वास के टूटने का दर्द है, जिसके तहत उन्होंने सरकार को अपना परिवार और मुखिया को अपना भाई माना था।

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