नई दिल्ली ।

देश की न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता से जुड़ा एक बहुत बड़ा मामला सामने आया है। आम तौर पर जब किसी व्यक्ति पर भ्रष्टाचार का आरोप लगता है, तो उसकी पूरी जांच होती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर किसी जज के खिलाफ शिकायत हो, तो उस पर क्या एक्शन होता है?

इसी अहम सवाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट और एक RTI एक्टिविस्ट के बीच दिल्ली हाई कोर्ट में बड़ी कानूनी बहस चल रही है। यह पूरा मामला जजों के खिलाफ आई 8630 शिकायतों से जुड़ा है।

आइए आसान भाषा में समझते हैं कि यह पूरा विवाद क्या है।

मामले की शुरुआत कैसे हुई?

इस विवाद की शुरुआत अप्रैल 2023 में हुई थी। पत्रकार और RTI एक्टिविस्ट सौरव दास ने सूचना के अधिकार (RTI) का इस्तेमाल करते हुए सुप्रीम कोर्ट से कुछ सीधे सवाल पूछे थे। उन्होंने पूछा था कि क्या मद्रास हाई कोर्ट के एक पूर्व जज के खिलाफ भ्रष्टाचार या गलत व्यवहार की शिकायतें मिली हैं? अगर हाँ, तो ऐसी कितनी शिकायतें आई हैं और उन पर क्या कार्रवाई की गई?

सुप्रीम कोर्ट ने जानकारी देने से क्यों किया मना?

सुप्रीम कोर्ट के जन सूचना अधिकारी (CPIO) ने यह जानकारी देने से साफ इनकार कर दिया। इसके पीछे दो मुख्य कारण बताए गए:

रिकॉर्ड न होना: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वे इस बात का कोई अलग से रिकॉर्ड नहीं रखते कि ‘किस जज के खिलाफ कौन सी शिकायत आई है’।

निजी जानकारी (Personal Information): सुप्रीम कोर्ट का यह भी तर्क था कि जजों के खिलाफ आने वाली शिकायतें उनकी निजी जानकारी के दायरे में आती हैं। इसलिए इन्हें RTI कानून के तहत आम जनता को नहीं दिया जा सकता।

संसद में सामने आया 8630 शिकायतों का आंकड़ा!

यह मामला तब और भी ज्यादा गरमा गया जब इसी साल फरवरी 2026 में केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय ने संसद में एक रिपोर्ट पेश की। इस रिपोर्ट में बताया गया कि साल 2016 से 2025 के बीच, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के ऑफिस को सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों के खिलाफ कुल 8630 शिकायतें मिली हैं। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि शिकायतों का यह पक्का आंकड़ा खुद सुप्रीम कोर्ट ने ही सरकार को दिया था।

दिल्ली हाई कोर्ट में प्रशांत भूषण ने उठाया सबसे बड़ा सवाल

RTI में जानकारी न मिलने पर मामला दिल्ली हाई कोर्ट पहुंच गया। 1 अप्रैल 2026 को इस केस की अहम सुनवाई हुई। एक्टिविस्ट की तरफ से मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने कोर्ट में बहुत मजबूती से अपनी बात रखी।

प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट की दलीलों पर सवाल उठाते हुए पूछा— “जब सुप्रीम कोर्ट खुद कह रहा है कि उसके पास जजों के नाम के हिसाब से शिकायतों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं है, तो फिर अभी फरवरी में संसद को 8630 शिकायतों का बिल्कुल सटीक आंकड़ा कहाँ से गिनकर दे दिया गया?”

उन्होंने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार या गलत काम की शिकायत किसी भी जज की ‘निजी जानकारी’ नहीं हो सकती। यह सीधे तौर पर जनता से जुड़ा मुद्दा है और देश की जनता को यह जानने का पूरा हक़ है कि इन शिकायतों पर क्या एक्शन लिया गया।

दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा है कि अगर जानकारी ऐसे ही छुपाई गई, तो जनता के बीच न्यायपालिका को लेकर बहुत गलत संदेश जाएगा।

हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों को एक ऐसा बीच का रास्ता निकालने को कहा है, जिससे ईमानदार जजों का सम्मान भी सुरक्षित रहे और देश की जनता को भी सच जानने का अधिकार मिले। इस बड़े मामले की अगली सुनवाई अब 7 मई 2026 को होनी है।

अब पूरे देश की नजरें इस बात पर हैं कि क्या न्यायपालिका खुद पर उठने वाले सवालों का जवाब खुलेपन और पारदर्शिता के साथ देगी? 

error: Content is protected !!