लाल सागर में नया भू-राजनीतिक मोड़: अमेरिका-हूती गुप्त बातचीत की चर्चाओं के बीच सऊदी अरब के सामने नई सुरक्षा चुनौतियाँ पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में कूटनीतिक और सैन्य समीकरण एक बार फिर तेजी से बदलते दिख रहे हैं। लाल सागर और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के सबसे अहम रास्तों में से एक ‘बाब अल-मंदेब’ के आसपास बढ़ते तनाव के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या अमेरिका अपने पारंपरिक सहयोगी सऊदी अरब को सुरक्षा के मोर्चे पर अकेला छोड़ रहा है। मस्कट में गुप्त बातचीत और शर्तों के दावे ओमान की राजधानी मस्कट से सामने आ रही रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी प्रतिनिधियों और यमन के हूती गुट के बीच पर्दे के पीछे बातचीत हुई है। इस समझौते के तहत दावा किया जा रहा है कि हूतियों ने लाल सागर से गुजरने वाले अमेरिकी सैन्य और व्यापारिक जहाजों को निशाना न बनाने पर सहमति जताई है। बदले में यह बात भी सामने आ रही है कि अमेरिका लाल सागर में हूतियों और सऊदी अरब के बीच बढ़ते टकराव में सीधे हस्तक्षेप से दूरी बना सकता है। सामरिक रास्ते पर पकड़ और टोल वसूली की तैयारी लाल सागर के किनारे स्थित प्रमुख रणनीतिक ठिकानों और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य पर हूती लड़ाकों की पकड़ मजबूत होने की खबरें हैं। इस रास्ते से दुनिया का बड़ा व्यापारिक और ऊर्जा परिवहन गुजरता है। बताया जा रहा है कि हूती अब इस समुद्री मार्ग से जाने वाले जहाजों पर नियंत्रण और टोल टैक्स जैसी व्यवस्था लागू करने की दिशा में बढ़ रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में व्यापारिक जोखिम बढ़ गया है। क्या अमेरिका अरब को भी मुश्किल में धकेल रहा है? इस पूरे घटनाक्रम ने यह गंभीर बहस छेड़ दी है कि क्या अमेरिका की नीति अब केवल अपने जहाजों और आर्थिक हितों को सुरक्षित करने तक सीमित रह गई है। पारंपरिक सुरक्षा गारंटी पर असर: दशकों तक खाड़ी देशों, विशेष रूप से सऊदी अरब के लिए अमेरिका मुख्य सुरक्षा कवच रहा है। अगर वाशिंगटन अपने जहाजों की सुरक्षा के बदले रियाद के हितों से किनारा करता है, तो इसे अरब जगत के साथ रणनीतिक विश्वासघात के रूप में देखा जाएगा। सऊदी अरब की घेराबंदी: यमन सीमा से लगातार ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना कर चुका सऊदी अरब यदि अमेरिकी सुरक्षा छत्र से बाहर होता है, तो पूरा अरब प्रायद्वीप सीधे सैन्य जोखिम के दायरे में आ सकता है। क्षेत्रीय शक्तियों की सक्रियता: चीन, ईरान और पाकिस्तान सऊदी अरब ने इस बदलते परिदृश्य को देखते हुए कूटनीतिक विकल्प तलाशने शुरू कर दिए हैं: चीन से मध्यस्थता की अपील: रियाद ने बीजिंग से संपर्क साधा है ताकि चीन अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर तेहरान के जरिए हूतियों के आक्रामक कदमों को रोक सके। पाकिस्तान की तत्परता: दूसरी तरफ, पाकिस्तान ने पुराने मक्का रक्षा समझौते का हवाला देते हुए यह दोहराया है कि सऊदी अरब की संप्रभुता और पवित्र स्थलों की रक्षा के लिए वह हर संभव सैन्य सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध है। कुल मिलाकर, लाल सागर में बढ़ता यह तनाव केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं है, बल्कि यह संकेत देता है कि वैश्विक महाशक्तियां अपने तात्कालिक हितों के लिए पुराने गठबंधनों को भी दांव पर लगाने से नहीं हिचक रही हैं। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Share on Telegram (Opens in new window) Telegram Share on Threads (Opens in new window) Threads Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp Like this:Like Loading...