केरल चुनाव 2026: 140 सीटों पर महामुकाबला | LDF, UDF vs BJP के बड़े वादे नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम: केरल विधानसभा चुनाव 2026 की रणभेरी बज चुकी है। राज्य की 140 सीटों पर 9 अप्रैल को मतदान होना है, और सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के लिए जादुई आंकड़ा 71 का है। केरल में दशकों से मुख्य लड़ाई वामपंथी गठबंधन (LDF) और कांग्रेस गठबंधन (UDF) के बीच ही रही है, लेकिन इस बार भाजपा (NDA) ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है, जिससे यह मुकाबला ‘त्रिकोणीय’ और बेहद दिलचस्प हो गया है। जनता को अपने पाले में करने के लिए सभी पार्टियों ने लोकलुभावन वादों और योजनाओं की पूरी झड़ी लगा दी है। आइए समझते हैं कि किसने कितना दम लगाया है और किसके वादों में कितना ‘वजन’ है: वोटरों के लिए वादों की ‘सुनामी’ (किस पार्टी की क्या है योजना?) • LDF (वामपंथी गठबंधन): लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का सपना देख रहे लेफ्ट ने आम आदमी की जेब पर फोकस किया है। सरकार ने अपनी मौजूदा सामाजिक सुरक्षा पेंशन को बढ़ाकर 2500 रुपये हर महीने करने का बड़ा ऐलान किया है। इसके साथ ही, ‘के-फोन’ योजना के जरिए राज्य के गरीब परिवारों को मुफ्त हाई-स्पीड इंटरनेट देने का वादा किया गया है। • UDF (कांग्रेस गठबंधन): सत्ता में वापसी के लिए बेताब कांग्रेस ने वामपंथियों को मात देने के लिए एक कदम आगे का दांव चला है। UDF ने पेंशन की रकम को LDF से ज्यादा, यानी 3000 रुपये प्रति माह करने की गारंटी दी है। इसके अलावा राज्य के समग्र विकास के लिए 5 प्रमुख गारंटियां भी जारी की गई हैं। • NDA (भाजपा गठबंधन): केरल में खुद को एक मजबूत ‘तीसरे विकल्प’ के तौर पर पेश कर रही भाजपा ने ‘भविष्य आरोग्य सुरक्षा कार्ड’ का मास्टरस्ट्रोक चला है। इसके तहत गरीब परिवारों की महिलाओं को राशन और दवाइयों के लिए हर महीने 2500 रुपये की आर्थिक सहायता दी जाएगी। किसानों को लुभाने के लिए सभी फसलों पर MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) लागू करने का भी वादा है। BJP के मिशन ‘साउथ’ के सामने 3 सबसे बड़ी चुनौतियां भले ही वादे बड़े हों, लेकिन केरल के राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदना भाजपा के लिए आसान नहीं है। जमीनी हकीकत में भाजपा के सामने ये 3 कड़ी चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं: 1. दो-ध्रुवीय राजनीति की दीवार: केरल की जनता दशकों से एक बार LDF और एक बार UDF को चुनती आई है। इस सेट हो चुके पुराने सिस्टम में सेंध लगाना सबसे बड़ा और पहला चैलेंज है। 2. अल्पसंख्यक वोट बैंक: राज्य में करीब 45 प्रतिशत आबादी मुस्लिम और ईसाई समुदायों की है। केरल की सत्ता की चाबी इन्हीं के पास मानी जाती है, और इन समुदायों के बीच गहरा विश्वास कायम करना भाजपा के लिए अब भी एक ‘टेढ़ी खीर’ साबित हो रहा है। 3. स्थानीय संगठन की कमजोरी: चुनाव जीतने के लिए हर बूथ और हर सीट पर मजबूत पकड़ वाले स्थानीय नेता चाहिए होते हैं। कई सीटों पर भाजपा के पास आज भी ऐसे कद्दावर उम्मीदवारों की कमी है जो सीधे तौर पर लेफ्ट या कांग्रेस को टक्कर दे सकें। राजनीतिक बिसात बिछ चुकी है और सारे दांव चले जा चुके हैं। अब 9 अप्रैल को केरल की जनता EVM का बटन दबाकर अपना फैसला सुनाएगी। 4 मई को नतीजे बताएंगे कि केरल में पुरानी परंपरा कायम रहती है, या कोई नया इतिहास रचा जाता है। Share this: Share on Facebook (Opens in new window) Facebook Share on X (Opens in new window) X Like this:Like Loading... Post navigation क्या मध्य प्रदेश की राजनीति में फिर लौटेंगे नरोत्तम मिश्रा? कांग्रेस विधायक के जेल जाने से दतिया में उपचुनाव की आहट बंगाल में CM मोहन यादव की हुंकार: क्या ‘लाडली बहना’ का दांव दीदी के ‘लक्ष्मी भंडार’ पर भारी पड़ेगा?