केरल में विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है। दशकों से यहां की सत्ता सिर्फ दो गठबंधनों (LDF और UDF) के बीच ही घूमती रही है। लेकिन इस बार बीजेपी पूरी ताकत के साथ इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए मैदान में उतरी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बीजेपी इस बार केरल के वोटरों को सच में लुभा पाएगी?

आइए समझते हैं पूरी रणनीति।

केरल विधानसभा की मौजूदा स्थिति (कुल सीटें: 140)

2021 के विधानसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर अभी पार्टियों की स्थिति इस प्रकार है:

LDF (लेफ्ट गठबंधन): 99 सीटें (पिनाराई विजयन के नेतृत्व में इनकी सरकार है)

UDF (कांग्रेस गठबंधन): 41 सीटें

NDA (बीजेपी गठबंधन): 0 सीटें (2021 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी का खाता नहीं खुला था, हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में त्रिशूर सीट पर मिली जीत ने बीजेपी के लिए संजीवनी का काम किया है। इस जीत ने साबित कर दिया कि केरल में भी बीजेपी चुनाव जीत सकती है। पार्टी इस समय उसी जीत की लहर को विधानसभा चुनाव में भुनाने की कोशिश कर रही है और जनता को यह संदेश दे रही है कि वे एक मजबूत ‘तीसरा विकल्प’ हैं।

केरल में धर्म और जाति की आबादी (लगभग आंकड़े)

केरल का सामाजिक ताना-बाना बाकी राज्यों से काफी अलग है। यहां अल्पसंख्यक आबादी निर्णायक भूमिका में होती है:

1. हिंदू धर्म (लगभग 54.7%)

हिंदुओं में मुख्य रूप से दो बड़ी जातियां राजनीति तय करती हैं:

• एझावा (Ezhava): लगभग 23% (यह सबसे बड़ा हिंदू वोट बैंक है और पारंपरिक रूप से LDF का समर्थक रहा है, लेकिन अब बीजेपी इन्हें अपने साथ लाने की कोशिश कर रही है)

नायर (Nair): लगभग 14% (यह सवर्ण हिंदू हैं और इनका झुकाव कांग्रेस और बीजेपी की तरफ रहता है)

• दलित (SC/ST): लगभग 10%

2. मुस्लिम धर्म (लगभग 26.6%)

• मुस्लिम वोट बैंक केरल में बहुत मजबूत है। इनका ज्यादातर समर्थन UDF (खासकर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग – IUML) और LDF के बीच बंटा रहता है।

3. ईसाई धर्म (लगभग 18.4%)

• ईसाई समुदाय भी केरल में एक बड़ी ताकत है। वे ज्यादातर UDF (कांग्रेस) के साथ रहे हैं, लेकिन अब बीजेपी इसी 18% आबादी में सेंध लगाने की सबसे बड़ी कोशिश कर रही है।

ईसाई वोटरों पर सबसे बड़ा दांव

बीजेपी की सबसे बड़ी उम्मीद इस बार ईसाई समुदाय से है। मुनंबम (Munambam) वक्फ बोर्ड जमीन विवाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बीजेपी खुलकर ईसाई समुदाय के समर्थन में खड़ी नजर आई है। पार्टी ने कई ईसाई उम्मीदवारों को मैदान में उतारकर यह साफ कर दिया है कि वे अब अपने पारंपरिक वोट बैंक से आगे बढ़कर एक नया समीकरण बना रहे हैं। अगर यह दांव सफल रहा, तो नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं।

भ्रष्टाचार पर चोट और ‘विकास’ का नारा

मौजूदा LDF सरकार इस समय भारी सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के कई आरोपों का सामना कर रही है। बीजेपी इसी नाराजगी को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रही है। इसके साथ ही, केंद्र की ‘मोदी सरकार’ के विकास कामों— जैसे वंदे भारत ट्रेन, हाईवे प्रोजेक्ट्स और गरीब कल्याण योजनाओं— को केरल के घर-घर तक पहुंचाया जा रहा है। उनका साफ नारा है कि जो सालों में नहीं बदला, उसे अब बदलना होगा।

केरल का वोटर राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक माना जाता है। कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF सत्ता में वापसी की पूरी उम्मीद लगाए बैठा है, वहीं LDF अपना किला बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। बीजेपी के लिए यहां की राह बिल्कुल भी आसान नहीं है। लेकिन अगर उनका सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला और ‘विकास’ का मुद्दा जनता के गले उतर गया, तो वे केरल की राजनीति में एक ऐसा उलटफेर कर सकते हैं, जिसकी किसी ने उम्मीद नहीं की होगी।

बीजेपी का पूरा फोकस 18% ईसाई आबादी और 14% नायर वोटरों को मिलाकर एक नया समीकरण बनाने पर है, क्योंकि 26% मुस्लिम वोटरों का समर्थन उन्हें मिलना मुश्किल है।”

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