हाल ही में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही 15-पॉइंट की शांति वार्ता फेल हो गई है। इसके तुरंत बाद ईरान ने खाड़ी (Gulf) देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर फिर से हमले तेज कर दिए हैं। पूरी दुनिया यह सोच रही है कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका से पंगा लेने में ईरान को अपनी बर्बादी का डर क्यों नहीं लग रहा है? आइए इस पूरी रणनीति को आसान भाषा में समझते हैं।

क्यों फेल हुई शांति वार्ता?

अमेरिका ने युद्ध को रोकने के लिए पाकिस्तान के जरिए 15 शर्तों वाला एक शांति प्रस्ताव भेजा था। लेकिन ईरान ने इसे पूरी तरह एकतरफा बताकर ठुकरा दिया। इसके बदले में ईरान ने अपनी 5 कड़ी शर्तें रख दीं, जिस वजह से दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बन पाई और बातचीत अटक गई।

खाड़ी देशों में क्यों हो रहे हैं हमले?

बातचीत रुकने के बाद ईरान ने सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे देशों में मौजूद अमेरिकी मिलिट्री बेस (Military Base) और तेल इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। इसके 2 मुख्य कारण हैं:

1. ईरान का कहना है कि अमेरिका और इजरायल लगातार उस पर हमले कर रहे हैं, इसलिए वह भी अपने बचाव में पलटवार कर रहा है।

2. ईरान तेल (Oil) और गैस की सप्लाई बाधित करके अमेरिका और दुनिया पर भयंकर आर्थिक दबाव बनाना चाहता है, ताकि युद्ध को रोका जा सके।

ईरान को अपनी बर्बादी का डर क्यों नहीं है?

ईरान इस समय पूरी तरह से ‘जैसे को तैसा’ (Tit-for-Tat) की आक्रामक नीति अपना रहा है। ईरान जानता है कि अगर अमेरिका ने उसके तेल ठिकानों को तबाह किया, तो ईरान भी चुप नहीं बैठेगा और वह बाकी खाड़ी देशों के तेल कुओं को भी बर्बाद कर देगा।

अगर ऐसा हुआ, तो पूरी दुनिया में तेल की भारी कमी हो जाएगी और कच्चे तेल के दाम 150 से 200 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकते हैं। इसका नतीजा यह होगा कि पूरी दुनिया में भयंकर महंगाई और मंदी आ जाएगी। अमेरिका खुद दुनिया की अर्थव्यवस्था को डुबाने का यह बड़ा जोखिम नहीं उठाना चाहता, और ईरान बहुत ही चालाकी से अमेरिका के इसी डर का फायदा उठा रहा है।

ईरान साफ तौर पर यह संदेश दे रहा है कि वह किसी के दबाव में झुकने वाला नहीं है। लेकिन यह रणनीति आग से खेलने जैसी है। अगर इस ‘जैसे को तैसा’ वाले खेल में कोई बड़ी चूक हो जाती है या कई सैनिकों की जान चली जाती है, तो यह तनाव एक विनाशकारी महायुद्ध में बदल सकता है। इसका सीधा असर भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और आम जनता की जेब पर भी पड़ेगा। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें इसी बात पर टिकी हैं कि यह कूटनीतिक लड़ाई किस मोड़ पर जाकर रुकेगी।

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